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जौ के औषधीय प्रयोग

हमारे ऋषियों-मुनियों का प्रमुख आहार जौ ही था। वेदों द्वारा यज्ञ की आहुति के रूप में जौ को स्वीकारा गया है। जौ को भूनकर, पीसकर, उस आटे में थोड़ा-सा नमक और पानी मिलाने पर सत्तू बनता है। कुछ लोग सत्तू में नमक के स्थान पर गुड़ डालते हैं व सत्तू में घी और शक्कर मिलाकर भी खाया जाता है। गेंहू , जौ और चने को बराबर मात्रा में पीसकर आटा बनाने से मोटापा कम होता है और ये बहुत पौष्टिक भी होता है .राजस्थान में भीषण गर्मी से निजात पाने के लिए सुबह सुबह जौ की राबड़ी का सेवन किया जाता है .

अगर आपको ब्लड प्रेशर की शिकायत है और आपका पारा तुरंत चढ़ता है तो फिर जौ को दवा की तरह खाएँ। हाल ही में हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि जौ से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है।कच्चा या पकाया हुआ जौ नहीं बल्कि पके हुए जौ का छिलका ब्लड प्रेशर से बहुत ही कारगर तरीके से लड़ता है।

खस घास के औषधीय प्रयोग

भारत में उगनेवाली इस घास की ओर दुनिया का ध्‍यान 1987 में विश्‍वबैंक के दो कृषि वैज्ञानिकों के जरिए गया। इसकी काफी रोचक कहानी है। विश्‍वबैंक के कृषि वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रिमशॉ और जॉन ग्रीनफिल्‍ड मृदा क्षरण ( Soil erosion ) पर रोक के उपाय की तल
ाश में थे। इसी दौरान उनका भारत में आना हुआ और उन्‍होंने कर्नाटक के एक गांव में देखा कि वहां के किसान सदियों से मृदा क्षरण पर नियंत्रण के लिए वेटीवर उगाते आए हैं। उन्‍होंने किसानों से ही जाना कि इसकी वजह से उनके गांवों में जल संरक्षण भी होता था तथा कुओं को जलस्‍तर ऊपर बना रहता था।
उसके बाद से विश्‍वबैंक के प्रयासों से दुनिया भर में वेटीवर को पर्यावरण संरक्षण के उपयोगी साधन के रूप में काफी लोकप्रियता मिली है। हालांकि भारतीय कृषि व पर्यावरण विभागों व इनसे संबद्ध वैज्ञानिकों ने इसमें खासी रुचि नहीं दिखायी। नतीजा यह है कि भारत में लोकप्रियता की बात तो दूर, इस पौधे का चलन कम होने लगा है।आप भले एयरकंडीशंड घरों में रहते हों, लेकिन गर्मियों में खस की टट्टियों की याद जरूर आती होगी। इस बात को अधिक से अधिक लोगों को जानने की जरूरत है कि इस वनस्‍पति की उपयोगिता आपके कमरों के तापमान को नियंत्रित रखने में ही नहीं, पर्यावरण को अनुकूलित रखने में भी है

इस घास की ऊपर की पत्तियों को काट दिया जाता है और नीचे की जड़ से खस के परदे तैयार किए जाते हैं। बताते हैं कि इसके करीब 75 प्रभेद हैं, जिनमें भारत में वेटीवेरिया जाईजेनियोडीज (Vetiveria zizanioides) अधिक उगाया जाता है।

बुखार हो तो इसकी जड़ का काढ़ा पीयें . उसमें गिलोय और तुलसी मिला लें तो और भी अच्छा रहेगा . हल्का बुखार हो या रह रह कर बुखार आये , बुखार टूट न रहा हो तो यह काढ़ा बहुत लाभदायक रहता है .

पित्त , एसिडिटी या घबराहट हो तो इसकी जड़ कूटकर काढ़ा बनाएं और मिश्री मिलाकर पीयें . चर्म रोग या एक्जीमा या एलर्जी हो तो इसकी 3-4 ग्राम जड़ में 2-3 ग्राम नीम मिलाकर काढ़ा बनाएं और सवेरे शाम पीयें .

दिल संबंधी कोई परेशानी हो तो इसकी जड़ में मुनक्का मिलाकर काढ़ा बनाकर मसलकर छानकर पीयें .इससे होरमोंस भी ठीक रहेंगे और धड़कन की गति भी ठीक रहेगी . किडनी की परेशानी में खस और गिलोय का काढ़ा सवेरे सवेरे पीयें . हाय बी. पी . हो या एंजाइना की समस्या हो तो इसकी जड़ और अर्जुन की छाल का काढ़ा पीयें .

प्यास बहुत अधिक लगती हो तो इसकी जड़ कूटकर पानी में ड़ाल दें . बाद में छानकर पानी पी लें . यह शीतल अवश्य है ; परन्तु इसे लेने से जोड़ों का दर्द बढ़ता नहीं है .

खस का इस्‍तेमाल सिर्फ ठंडक के लिए ही नहीं होता, आयुर्वेद जैसी परंपरागत चिकित्‍सा प्रणालियों में औषधि के रूप में भी इसका इस्‍तेमाल होता है। इसके अलावा इससे तेल बनता है और इत्र जैसी खुशबूदार चीजों में भी इसका उपयोग होता है।

खस का अत्तर.

इसका एक तोला आप 25 रुपये से 1000 रुपये तक का खरीद सकते हैं. इसे भी शरीर पर सुबह लगाने पर शाम तक लोग पूछते रहते हैं कि यह भीनी भीनी सुगंध कहां से आ रही है. दो तोला खस साल भर काम आ जाता है.

खस का अत्तर लगाने वालो को सकून देता है, मानसिक तौर पर ठंडाई की अनुभूति देता है, और मन को स्वस्थ रखता है. इसके मनोवैज्ञानिक कारण हैं, लेकिन औषधि स्तर पर भी कई कारक हैं. अफसोस यह है कि कद्रदानों के अभाव में खास का अत्तर लगभग लुप्त सा हो गया है.

अच्छे किस्म का अत्तर खस के अच्छे गुणों वाले जडों से बनाया जाता है और उसको हलके चंदन या गुलाब के अत्तर का पुट दिया जाता है. इससे अत्तर का तीखापन कम होकर भीना भीना सा गंध देने लगता है. अत्तर अच्छी किस्म का हो तो आप के आसपास के लोगों को यह महक दिन भर मिलती रहेगी जबको आप को अगले स्नान के समय तक यह महक मिलती रहेगी.

उम्दा किस्म का अत्तर खरीदें और प्रयोग करें. बस स्नान करने के बाद बहुत ही हल्के से अपने छाती, गर्दन, और हाथों पर लगा लें. अत्तर की कम से कम मात्रा का प्रयोग पर्याप्त रहता है.

ग्वारपाठे (Aloe Vera) के प्रयोग

"1. जलना :- *शरीर के जले हुए स्थान पर ग्वारपाठे का गूदा बांधने से फफोले नहीं उठते तथा तुरन्त ठंडक पहुंचती है।
*ग्वारपाठे के पत्तों के ताजे रस का लेप करने से जले हुए घाव भर जाते हैं।
*घी ग्वार के पत्ते को चीरकर इसके गूदे को निकालकर त्वचा पर दिन में 2-3 बार लगाने से जलन दूर होकर ठंडक मिलती है और घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है।
*ग्वारपाठा के छिलके को उतारकर इसे पीस लें फिर शरीर के जले हुए भाग पर लेप करें इससे जलन मिट जाती है और जख्म भी भर जाता है।
*ग्वारपाठे के गूदे के चार भाग में दो भाग शहद मिलाकर जले हुए भाग पर लगाने से आराम मिलता है।
*आग से जले हुए भाग पर ग्वारपाठे का गूदा लगाने से जलन शांत हो जाती है और फफोले भी नहीं उठते हैं।

2. सिर दर्द :- *ग्वारपाठे का रस निकालकर उसमें गेहूं का आटा मिलाकर उसकी 2 रोटी बनाकर सेंक लें। इसके बाद रोटी को हाथ से दबाकर देशी घी में डाल दें। इसे सुबह सूरज उगने से पहले इसे खाकर सो जाएं। इस प्रकार 5-7 दिनों तक लगतार इसका सेवन करने से किसी भी प्रकार का सिर दर्द हो वह ठीक हो जाता है।
*सिर में दर्द होने पर ग्वारपाठे के गूदे में थोड़ी मात्रा में दारुहरिद्रा का चूर्ण मिलाकर गर्म करें और दर्द वालें स्थान पर इसे लगाकर पट्टी कर लें इससे दर्द ठीक हो जाएगा।

3. गंजापन :- लाल रंग का ग्वारपाठा (जिसमें नारंगी और कुछ लाल रंग के फूल लगते हैं) के गूदे को स्प्रिट में गलाकर सिर पर लेप करने से बाल काले हो जाते हैं तथा गंजे सिर पर बाल उगने लगते हैं।

4. कुत्ते के काटने पर :- ग्वारपाठे को एक ओर से छीलकर इसके गूदे पर पिसा हुआ सेंधानमक डालें, फिर इसे कुत्ते के काटे हुए स्थान पर लगा दें। इस प्रयोग को लगातार दिन में 4 बार करने से लाभ मिलता है।

5. पेट के रोग :- *5 चम्मच ग्वारपाठे का ताजा रस, 2 चम्मच शहद और आधे नींबू का रस मिलाकर सुबह-शाम दिन में पीने से सभी प्रकार के पेट के रोग ठीक हो जाते हैं।
*25 ग्राम ग्वारपाठे के ताजे रस, 12 ग्राम शहद और आधे नींबू का रस मिलाकर दिन में 2 बार सुबह और शाम पीने से पेट के हर प्रकार के रोग ठीक हो जाते है।
*ग्वारपाठा के गूदे को गर्म करके सेवन करने से पेट में गैस बनने की शिकायत दूर हो जाती है।
*6 ग्राम ग्वारपाठा का गूदा, 6 ग्राम गाय का घी, 1 ग्राम हरीतकी का चूर्ण और 1 ग्राम सेंधानमक को एक साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से पेट में गैस बनने की शिकायत दूर हो जाती है।
*ग्वारपाठा के पत्तों के दोनों ओर के जो कांटे लगे होते हैं उसे अच्छी प्रकार साफ कर लें, फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े काटकर एक बर्तन में डाल दें और इसमें आधा किलो नमक डालकर मुंह बंद कर दें। इसके बाद इसे 2-3 दिन तक धूप में रखें, बीच-बीच में इसे हिलाते रहें। तीन दिन बाद इसमें 100 ग्राम हल्दी, 60 ग्राम भुनी हींग, 300 ग्राम अजवायन, 100 ग्राम शूंठी, 60 ग्राम कालीमिर्च, 100 ग्राम धनिया, 100 गाम सफेद जीरा, 50 ग्राम लालमिर्च, 60 ग्राम पीपल, 50 ग्राम लौंग, 50 ग्राम अकरकरा, 100 ग्राम कालाजीरा, 50 ग्राम बड़ी इलायची, 50 ग्राम दालचीनी, 50 ग्राम सुहागा, 300 ग्राम राई को बारीक पीसकर डाल दें। रोगी के शरीर की ताकत के अनुसार इसमें से 3 ग्राम से 6 ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से पेट के वात-कफ संबन्धी सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
*ग्वारपाठा के 10-20 जड़ों को कुचलकर उबालकर छान लें फिर इस पर भूनी हुई हींग छिड़ककर सेवन करें इससे पेट का दर्द ठीक हो जाता है।
*10 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे का ताजा रस में 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से पेट के रोगों में लाभ मिलता है।
*ग्वारपाठा के गूदे से पेट पर लेप करें इससे आंतों में जमा मल गुदा से निकल जाएगा और पेट के अन्दर की गांठे गल जाएंगी जिसके फलस्वरूप पेट में कब्ज बनने की समस्या दूर हो जाएगी तथा पेट में दर्द होना भी बंद हो जाएगा।
*ग्वारपाठे की जड़ और थोड़ी-हींग को भूनकर पीस लें और इसे पानी में मिलाकर पीने से पेट का दर्द समाप्त हो जाता है।

6. अम्लपित्त :- ग्वारपाठे के 14 से 28 मिलीमीटर पत्तों का रस दिन में 2 बार पीने से अम्लपित्त में लाभ मिलता है तथा इसके कारण से होने वाला सिर दर्द ठीक हो जाता है।

7. प्लीहोदर (तिल्ली के कारण होने वाला पेट का दर्द) :- ग्वारपाठे के पत्तों के रस 14 से 28 मिलीलीटर की मात्रा को 1 से 3 ग्राम सरफोंका के पंचांग (जड़, पत्ता, तना, फल और फूल) के चूर्ण के साथ दिन में सुबह और शाम सेवन करने से प्लीहोदर के रोग में लाभ मिलता है।

8. स्त्री रोग :- स्त्री रोग को ठीक करने के लिए ग्वारपाठे के 14-28 मिलीलीटर पत्तों के रस को आधा ग्राम भुनी हींग के साथ दिन में दो बार सेवन करना चाहिए।

9. सूजन :- * ग्वारपाठा के पत्तों का रस में सफेद जीरा और हल्दी को पीसकर मिला दें, इससे लेप बन जाएग। इस लेप को दिन में 2-3 बार सूजन पर लगाने से लाभ मिलता है।
*लगभग 10-10 ग्राम ग्वारपाठे के पत्ते और सफेद जीरा को पीसकर सूजन वाले अंग पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है।

10. फोड़े-फुंसियां :-
*ग्वारपाठा का गूदा गर्म करके फोड़े-फुंसियों पर बांधे इससे या तो वह बैठ जाएगी या फिर पककर फूट जाएगी। जब फोड़े-फुन्सी जाएं तो इस पर ग्वारपाठा के गूदे में हल्दी मिलाकर लगाए इसे घाव जल्दी ठीक हो जाएगा।
*ग्वारपाठे का गूदा निकालकर गर्म करके उसमें 2 चुटकी हल्दी मिला लें, फिर इसकों फोड़े पर लगाकर ऊपर से पट्टी बांध दें। थोड़े ही समय में फोड़ा पककर फूट जायेगा और उसका मवाद बाहर निकल जायेगा। मवाद निकलने के बाद फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जायेगा।

11. बवासीर :- *ग्वारपाठा के गूदे में थोड़ा पिसा हुआ गेरू मिलाकर मस्सों पर बांधने से जलन, पीड़ा, दूर होकर बवासीर के मस्सों से खून बहना बंद हो जाता है और आराम मिलता है।
*खूनी बवासीर में 50 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में 2 ग्राम पिसा हुआ गेरू मिलाकर इसकी टिकिया बना लें। इस टिकिया को रुई के फोहे पर फैलाकर बवासीर के स्थान पर लंगोटी की तरह पट्टी बांध दें। इससे मस्सों में होने वाली जलन तथा दर्द ठीक हो जाता है और मस्से सिकुड़कर दब जाते हैं। यह प्रयोग खूनी बवासीर में लाभकारी होता है"

12. हिचकी :- *2 चम्मच ग्वारपाठा का रस आधे चम्मच सोंठ के चूर्ण के साथ सेवन करने से हिचकी में आराम मिलता है।
*6 ग्राम ग्वारपाठे के रस में 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से हिचकी जल्द बंद हो जाती है।

13. मासिकधर्म ठीक प्रकार से न आना :- *ग्वारपाठा के 20 गूदे में 10 ग्राम पुराना गुड़ मिलाकर सेवन करें। ऐसी मात्रा दिन में दो बार 3-4 दिनों तक सेवन करने से महिलाओं का मासिकधर्म ठीक समय पर आने लगता है।
*10 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे पर लगभग आधा ग्राम पलाश का क्षार छिडककर दिन में दो बार सेवन करने से मासिकधर्म सही समय पर आने लगता है।


14. पौष्टिक, बलवर्द्धक योग :- ग्वारपाठा के 2 पत्तों को चीरकर उसका सारा गूदा निकाल लें। उसमें नीम गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण मिलाकर रोजाना 1 बार सेवन करते रहने से शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।

15. कमर दर्द :- *20-25 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम कुछ दिन तक सेवन करने से कमर का दर्द ठीक हो जाता है।
*10 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा, 50 ग्राम सोंठ, 4 लौंग, 50 ग्राम नागौरी असगंध इन सबको पीसकर चटनी बना लें। 4 ग्राम चटनी रोजाना सुबह सेवन करें। इससे कमर दर्द में आराम मिलेगा।
*20 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में 2 ग्राम शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से शीत लहर के कारण उत्पन्न कमर दर्द से राहत मिलता है।
*गेहूं के आटे में ग्वारपाठा का गूदा इतना मिलाए जितना आटे को गूंथने के लिए काफी हो, इसके बाद आटे को गूंथकर रोटी बना लें। इस रोटी का चूर्ण बनाकर इसमें चीनी और घी मिला दें और लड्डू बना लें। इस लड्डू का सेवन करने से कमर का दर्द ठीक हो जाता है।

16. कान दर्द :- *ग्वारपाठे के रस को गर्म करके जिस कान में दर्द हो, उससे दूसरी तरफ के कान में 2-2 बूंद डालने से कानों का दर्द दूर हो जाता है।
*ग्वारपाठे के रस को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।

17. मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन) :- 50 ग्राम ग्वारपाठे के गूदे में चीनी मिलाकर खाने से पेशाब करने में जलन और दर्द की समस्या दूर हो जाती है।

18. बच्चों की कब्ज :- छोटे बच्चों की नाभि पर साबुन के साथ ग्वारपाठे के
गूदे का लेप करने से दस्त साफ होते हैं और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है।

19. उपदंश (फिरंग) :- *उपदंश के कारण से उत्पन्न घावों पर ग्वारपाठा के गूदे का लेप लगाने से लाभ मिलता है।
*ग्वारपाठे के 5 ग्राम रस में 5 ग्राम जीरे को पीसकर लेप करने से उपदंश की बीमारी दूर होती है।

20. मधुमेह :- मधुमेह रोग में ग्वारपाठा का 5 ग्राम गूदा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम गूडूची के रस के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।

21. कामला (पीलिया) :- *कामला (पीलिया) के रोग में ग्वारपाठा का 10-20 मिलीलीटर रस दिन में 2 से 3 बार पीने से पित्त नलिका का अवरोध दूर होकर लाभ मिलता है। इस प्रयोग से आंखों का पीलापन और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। इसके रस को रोगी की नाक में बूंद-बूंद करके डालने से नाक से निकलने वाले पीले रंग का स्राव होना बंद हो जाता है।
*लगभग 3 से 6 ग्राम ग्वारपाठा गूदे को मट्ठा के साथ सेवन करने से प्लीहावृद्धि (तिल्ली का बढ़ना), यकृतवृद्धि (जिगर का बढ़ना), आध्यमानशूल (पेट में गैस बनने के कारण दर्द), तथा अन्य पाचन संस्थान के रोगों के कारण होने वाला पीलिया रोग ठीक हो जाता है तथा ये रोग भी ठीक हो जाते हैं।
*ग्वारपाठा के पत्तों का गूदा निकाल दें और इसके बाद जो छिलका बचे उसे मटकी में भर दें तथा फिर इसमें बराबर मात्रा में नमक मिलाकर मटकी का मुंह बंद करके कंडों की आग में रख दें। जब मटकी के अन्दर का द्रव्य जलकर काला हो जाए तो उसे बारीक पीसकर शीशी में भरकर रख दें। इसमें में कुछ मात्रा में सुबह तथा शाम को सेवन करने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।"

22. जिगर की कमजोरी :- 20 ग्राम ग्वारपाठा के पत्तों का रस तथा 10 ग्राम शहद दोनों द्रव्यों को चीनी मिट्टी के बर्तन में मुंह बंद करके 1 सप्ताह तक धूप में रखें, इसके बाद इसे छान लें। इसमें से 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से यकृत विकारों (जिगर के रोगों) को दूर करने में लाभ मिलता है। इसकी अधिक मात्रा विरेचक होती है परन्तु उचित मात्रा में सेवन करने से मल एवं वात की प्रवृत्ति, ठीक होने लगती है। इसमें सेवन से यकृत (जिगर) मजबूत हो जाता है और उसकी क्रिया सामान्य हो जाती है।

23. तिल्ली :- ग्वारपाठा के गूदे पर सुहागा को छिड़ककर सेवन करने से तिल्ली कट जाती है।

24. जोड़ों के (गठिया) दर्द :- 10 ग्वारपाठा के गूदा का सेवन रोजाना सुबह-शाम करने से गठिया रोग दूर हो जाता है।

25. ज्वर :- 10 से 20 ग्राम ग्वारपाठा की जड़ का काढ़ा दिन में 3 बार पीने से ज्वर कम हो जाता है।

26. व्रण (घाव), चोट और गांठ :- *यदि घाव पका न हो तो ग्वारपाठे के गूदे में थोड़ी सज्जीक्षार तथा हरिद्रा चूर्ण मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को घाव पर लगा दें इससे घाव पककर फूट जाएगा और यह जल्दी ही ठीक हो जाएगा।
*शरीर की किसी ग्रंथि में गांठ पड़ जाए तो वहां पर ग्वारपाठा का गूदा में लहसुन और हल्दी मिलाकर इसे हल्का गर्म करके गांठ पर लगाए इससे आराम मिलता है।
*गांठों की सूजन पर ग्वारपाठे के पत्ते को एक ओर से छीलकर तथा उस पर थोड़ा सा हरिद्रा चूर्ण छिड़ककर इसे हल्का गर्म करके गांठों की सूजन पर लगाएं इससे आराम मिलेगा।
*चोट, मोच तथा कुचले जाने पर दर्द या सूजन हो रहा हो तो ग्वारपाठे के गूदें में अफीम तथा हल्दी का चूर्ण मिलाकर इसे सूजन तथा दर्द वाले भाग पर लगा लें इससे लाभ मिलेगा।
*औरतों के स्तन पर चोट लगने के कारण या किसी अन्य कारण से गांठ या सूजन हो गया हो तो ग्वारपाठे की जड़ का चूर्ण बनाकर उसमें थोड़ा सा हरिद्रा चूर्ण मिलाकर इसे हलक गर्म करें और गांठ या सूजन वाले भाग पर लगाकर पट्टी बांध लें इससे सूजन कम हो जाती है और दर्द भी ठीक हो जाता है। इस तरह से उपचार दिन में 2-3 बार करते रहना चाहिए।
*ग्वारपाठे की जड़ को घाव पर लगाने से हड्डी के घाव और पुराने घाव ठीक हो जाते हैं।
*ग्वारपाठे के पत्ते का टुकड़ा करके इसके एक ओर का छिल्का हटा दें और छिल्के हटे हुए भाग पर रसोत और हल्दी छिड़ककर हल्का गर्म करें फिर इसे गांठ वाले भाग पर बांध दें इससे लाभ मिलेगा।

27. पेट की गांठ :- *ग्वारपाठे के गूदे को पेट के ऊपर बांधने से पेट की गांठ बैठ जाती है। कठोर पेट मुलायम हो जाता है और आंतों में जमा हुआ मल बाहर निकल जाता है।
*60 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा और 60 ग्राम घी को एक साथ मिलाकर उसमें 10 ग्राम हरीतकी चूर्ण तथा 10 ग्राम सेंधा नमक मिलाकर अच्छी तरह घोंट लें, फिर इसमें से 10-15 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से पेट की गांठे बैठ जाती है। वातज गुल्म और वातजन्य रोगों की अवस्था में गुनगुने पानी के साथ प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

28. नासूर :- ग्वारपाठे के गूदे को आग में पकाकर नासूर पर बांधने से नासूर या उसका फोड़ा पककर फूट जाता है और रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है

29. दमा :- *ग्वारपाठा के 250 ग्राम पत्तों और 25 ग्राम सेंधानमक के चूर्ण को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर, बर्तन को आग पर रखें जब ये पदार्थ जलकर राख बन जाएं तब इसे आग से उतार दें। इस राख को 2 ग्राम की मात्रा में 10 ग्राम मुनक्का के साथ सेवन करने से दमा (श्वास रोग) में अधिक लाभ मिलता है।
*ग्वारपाठे का 1 किलो गूदा लेकर किसी साफ कपड़े से छान लें फिर इसे किसी कलईदार बर्तन में डालकर धीमी आंच पर पकाएं, जब यह अधपका हो जाए तब इसमें 36 ग्राम लाहौरी नमक का बारीक चूर्ण मिला दें तथा स्टील के चम्मच से अच्छी तरह से घोट दें। जब सब पानी जलकर चूर्ण शेष रह जाये तो बर्तन को आग पर से उतारकर ठंडा करें और इसका बारीक चूर्ण बना लें तथा साफ बोतल में भर दें। इसमें से लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम की मात्रा को शहद के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पुरानी से पुरानी खांसी, काली खांसी और दमा ठीक हो जाता है।

30. खांसी :- *आधा चम्मच ग्वारपाठे का रस में चुटकी भर पिसी हुई सोंठ मिलाकर शहद के साथ चाटे इससे खांसी ठीक हो जाती है।
*ग्वारपाठा का गूदा और सेंधा नमक दोनों को जलाकर राख बना लें और इसमें से 12 ग्राम की मात्रा में मुनक्का के साथ सुबह-शाम सेवन करने से खांसी तथा पुरानी खांसी ठीक हो जाती है तथा कफ की समस्या भी दूर होती है।

31. आंखों के दर्द :- *सोते समय ग्वारपाठे के गूदे का रस आंखों मे डालने से आंखों का दर्द दूर होता है।
*ग्वारपाठे के गूदे में हल्दी का चूर्ण मिलाकर गर्म करें और सहनीय अवस्था में पैरों के तलुवों में इसे लगाकर पट्टी बांध दें इससे आंखों दर्द ठीक हो जाता है।
*ग्वारपाठे का गूदा आंखों के ऊपर लगाने से आंखों की लाली मिट जाती है, गर्मी दूर होती है। वायरल कंजक्टीवाइटिस में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है।
*ग्वारपाठे के 1 ग्राम गूदे में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिलाकर पोटली बना लें और इसे पानी में भिगोंकर आंखों पर रखने से और इसमें से 1-2 बूंद आंखों के अन्दर डालने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है।
*ग्वारपाठे के गूदे पर हल्दी डालकर थोड़ा गर्म करके आंखों में लगाने से आंखों का दर्द चला जाता है।

32. कब्ज :- *ग्वारपाठे का गूदा 10 ग्राम में 4 पित्त्त्तयां तुलसी और थोड़ी-सी सनाय की पित्त्त्तयां पीसकर मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट का सेवन खाना खाने के बाद करने से कब्ज की शिकायत खत्म हो जाती है।
*20 ग्राम ग्वारपाठा में थोड़ी-सी मात्रा में काला नमक मिलाकर सुबह और शाम खाली पेट खाने से कब्ज दूर होती है।
*ग्वारपाठा का रस 10 से 20 ग्राम की मात्रा में हरड़ के साथ सेवन करने से मलअवरोध की परेशानी दूर होती है जिसके फलस्वरूप कब्ज की समस्या दूर होती है।

33. नपुंसकता (नामर्दी) :- ग्वारपाठे का गूदा और गेहूं का आटा बराबर मात्रा में लेकर इसमें घी मिला लें फिर इसके 2 गुने की मात्रा में चीनी इसमें मिलाकर हलुआ बना लें और इसका सेवन 7 दिनों तक करने से नपुंसकता दूर होती है।

34. अग्निमान्द्यता (अपच) :- *ग्वारपाठा को पीसकर रस निकाल लें और इसमें नौसादा को मिलाकर रख लें, फिर इसके इसमें से आधा-आधा चम्मच रस को खुराक के रूप में सुबह और शाम सेवन करें इससे अपच की शिकायत दूर हो जाती है।
*ग्वारपाठे का गूदा सेंधा नमक के साथ सेवन करने से आराम मिलेगा।"

35. जिगर का रोग :- *3 ग्राम ग्वारपाठे के रस में सेंधा नमक व समुंद्री नमक मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से यकृत के बीमारी ठीक हो जाती है।
*लगभग आधा ग्राम ग्वारपाठे के रस में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग हल्दी का चूर्ण और सेंधा नमक लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से जिगर का बढ़ना बंद हो जाता है।
*10-20 ग्राम ग्वारपाठे का रस को सेंधा और हरिद्रा के साथ सेवन करने से यकृत के बीमारी ठीक हो जाती है तथा इससे यकृत का बढ़ना, दर्द होना, और पीलिया का होना आदि रोग भी ठीक हो जाते हैं।
*लगभग आधा ग्राम ग्वारपाठे का रस में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग हल्दी के चूर्ण और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग सेंधा नमक का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बढ़ा हुआ यकृत ठीक हो जाता है।
*ग्वारपाठे के पत्ते का रस आधा चम्मच, हल्दी का चूर्ण एक चुटकी तथा पिसा हुआ सेंधा नमक 1 चुटकी तीनों को मिलाकर पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें इससे यकृत रोग में लाभ मिलेगा।"

36. जलोदर (पेट में पानी भर जाना) :- ग्वारपाठे के रस में हल्दी का चूर्ण मिलाकर पीने से प्लीहा और भोजन के न पचने वाली बीमारी में लाभ मिलता है

37. स्तनों की जलन और सूजन :- ग्वारपाठे के रस में हरिद्रा के चूर्ण को मिलाकर इससे स्तनों पर लेप करें। इससे स्तनों पर होने वाली सूजन और जलन दूर हो जाती है।

38. हाथ-पैर का फटना :- भोजन में ग्वारपाठे की सब्जी खाने से हाथ-पैर नहीं फटते हैं।

अनन्त-मूल (कृष्णा सारिवा) औषधीय प्रयोग

विभिन्न भाषाओं के नाम : 
हिंदी कालीसर, कालीदूधी, श्यामलता, सारिवा।
संस्कृत कृष्णसारिवा, कृष्णमूली, कालपेशी, चंदन बंगाली सारिवा कालघंटिका, सुभद्रा श्यामलता।
मराठी मोठीकावड़ी, उपरसरी, कालीकावड़ी,
गुजराती काली उपलसरी, धूरीबेल।
बंगला श्यामलता, दूधी, कलघंटी।
पंजाबी अनन्तमूल।
अंग्रेजी इंडियन सारसापरीला (Indian Sasaprila.P.)
लैटिन इकनोकार्पस फ्रटीसंस (Ichnocarpust Frutescens)

गुण: यह वात पित्त, रक्तविकार, प्यास, अरुचि, उल्टी, बुखारनाशक, शीतल, वीर्यवर्द्धक, कफनाशक, मधुर, धातुवर्द्धक, भारी, स्निग्ध, कड़वी, सुगन्धित, स्तनों के दूध को शुद्ध करने वाला, जलन, मंदाग्नि और सांस-खांसी नाशक है।

विभिन्न रोगों में अनन्तमूल से उपचार:

1 सिर दर्द :-*अनन्तमूल की जड़ को पानी में घिसने से बने लेप को गर्म करके मस्तक पर लगाने से पीड़ा दूर होती है।
*लगभग 6 ग्राम अनन्तमूल को 3 ग्राम चोपचीनी के साथ खाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।"

2 बच्चों का सूखा रोग :-अनन्तमूल की जड़ और बायबिडंग का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिलाकर आधे चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम सेवन कराने से बच्चे का स्वास्थ्य सुधर जाता है।

3 पथरी और पेशाब की रुकावट :-अनन्तमूल की जड़ के 1 चम्मच चूर्ण को 1 कप दूध के साथ 2 से 3 बार पीने से पेशाब की रुकावट दूर होकर पथरी रोग में लाभ मिलता है। मूत्राशय (वह स्थान जहां पेशाब एकत्रित होता है) का दर्द भी दूर होता है।

4 रक्तशुद्धि हेतु (खून साफ करने के लिए) :-100 ग्राम अनन्तमूल का चूर्ण, 50 ग्राम सौंफ और 10 ग्राम दालचीनी मिलाकर चाय की तरह उबालें, फिर इसे छानकर 2-3 बार नियमित रूप से पीने से खून साफ होकर अनेक प्रकार के त्वचा रोग दूर होंगे।

5 मुंह के छाले :-शहद के साथ अनन्तमूल की जड़ का महीन चूर्ण मिलाकर छालों पर लगाएं।

6 घाव :-अनन्तमूल का चूर्ण घाव पर बांधते रहने से वह जल्द ही भर जाता है। घाव पर अनन्तमूल पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

7 पीलिया (कामला) :-*1 चम्मच अनन्तमूल का चूर्ण और 5 कालीमिर्च के दाने मिलाकर एक कप पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए, तब छानकर इसकी एक मात्रा नियमित रूप से एक हफ्ते तक सुबह खाली पेट पिलाने से रोग दूर हो जाएगा।
*अनन्तमूल की जड़ की छाल 2 ग्राम और 11 कालीमिर्च दोनों को 25 मिलीलीटर पानी के साथ पीसकर 7 दिन पिलाने से आंखों एवं शरीर दोनों का पीलापन दूर हो जाता है तथा कामला रोग से पैदा होने वाली अरुचि और बुखार भी नष्ट हो जाता है।"

8 सर्प के विष में :-चावल उबालने के पश्चात उसके पानी को किसी बर्तन में निकालकर, अनन्तमूल की जड़ का महीन चूर्ण 1 चम्मच मिलाकर दिन में 2 या 3 बार पिलाने से लाभ होगा।

9 गर्भपात की चिकित्सा :-*जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात होता हो, उन्हें गर्भस्थापना होते ही नियमित रूप से सुबह-शाम 1-1 चम्मच अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण सेवन करते रहना चाहिए। इससे गर्भपात नहीं होगा और शिशु भी स्वस्थ और सुंदर होगा।
*उपदंश या सूजाक के कारण यदि बार-बार गर्भपात हो जाता हो तो अनन्तमूल का काढ़ा 3 से 6 ग्राम की मात्रा में गर्भ के लक्षण प्रकट होते ही सेवन करना करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इससे गर्भ नष्ट होने का भय नहीं रहता है। इससे कोई भी आनुवांशिक रोग होने वाले बच्चे पर नहीं होता है। "

10 नेत्र रोग (आंखों की बीमारी) :-*अनन्तमूल की जड़ को बासी पानी में घिसकर नेत्रों में अंजन करने से या इसके पत्तों की राख कपड़े में छानकर शहद के साथ आंखों में लगाने से आंख की फूली कट जाती है।
*अनन्तमूल के ताजे मुलायम पत्तों को तोड़ने से जो दूध निकलता है उसमें शहद मिलाकर आंखों में लगाने से नेत्र रोगों में लाभ होता है।
*अनन्तमूल से बने काढ़े को आंखों में डालने से या काढ़े में शहद मिलाकर लगाने से नेत्र रोगों में लाभ होता है।"

11 दमा :-दमे में अनन्तमूल की 4 ग्राम जड़ और 4 ग्राम अडू़से के पत्ते के चूर्ण को दूध के साथ दोनों समय सेवन करने से सभी श्वास व वातजन्य रोगों में लाभ होता है।

12 लंबे बालों के लिए :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 2-2 ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार पानी के साथ सेवन करने से सिर का गंजापन दूर होता है।

13 दंत रोग :-अनन्तमूल के पत्तों को पीसकर दांतों के नीचे दबाने से दांतों के रोग दूर होते हैं।

14 स्तनशोधक :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 3 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से स्तनों की शुद्धि होती है। यह दूध को बढ़ा देता है। जिन महिलाओं के बच्चे बीमार और कमजोर हो, उन्हें अनन्तमूल की जड़ का सेवन करना चाहिए।

15 पेट के दर्द में :-अनन्तमूल की जड़ को 2-3 ग्राम की मात्रा में लेकर पानी में घोटकर पीने से पेट दर्द नष्ट होता है।

16 मंदाग्नि (अपच) :-अनन्तमूल का चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से पाचन क्रिया बढ़ती है। इससे पाचनशक्ति बढ़ती है तथा रक्तपित्त दोष का नाश होता है।

17 मूत्रविकार (पेशाब की खराबी) :-अनन्तमूल की छोटी जड़ को केले के पत्ते में लपेटकर आग की भूभल में रख दें। जब पत्ता जल जाये तो जड़ को निकालकर भुने हुए जीरे और शक्कर के साथ पीसकर, गाय का घी मिलाकर सुबह-शाम लेने से मूत्र और वीर्य सम्बंधी विकार दूर होते हैं। बारीक पिसी हुई अनन्तमूल की जड़ के चूर्ण का लेप मूत्रेन्द्रिय पर करने से मूत्रेन्द्रिय की जलन मिटती है।

18 अश्मरी (पथरी) में :-अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट होना) में अनन्तमूल की जड़ का 5 ग्राम चूर्ण गाय के दूध के साथ दिन में सुबह और शाम सेवन करने से लाभ होता है।

19 सन्धिवात (जोड़ों का दर्द) :-अनन्तमूल के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार देने से सन्धिवात में लाभ होता है।

20 रक्तविकार :-*अनन्तमूल 30 ग्राम, जौकुट कर 1 लीटर पानी में पकावें, जब यह आठवां भाग शेष बचे तो इसे छानकर उचित मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से खुजली, दाद, कुष्ठ आदि रक्तविकार दूर होते हैं।
*अनन्तमूल 500 ग्राम जौकुट कर 500 मिलीलीटर खौलते हुए पानी में भिगो दें और 2 घण्टे बाद छान लें। 50 ग्राम की मात्रा में दिन में 4-5 बार पिलाने से रक्तविकार और त्वचा के विकार शीघ्र दूर होते हैं।
*पीपल की छाल और अनन्तमूल इन दोनों को चाय के समान फांट (घोल) बनाकर सेवन करने से दाद-खाज, खुजली, फोड़े-फुन्सी तथा गर्मी के विकारों में लाभ होता है।
*सफेद जीरा 1 चम्मच और अनन्तमूल का चूर्ण 1 चम्मच दोनों का काढ़ा बनाकर पिलाने से खून साफ हो जाता है।
*फोड़े-फुन्सी-गंडमाला और उपदंश सम्बंधी रोग मिटाने के लिए अनन्तमूल की जड़ों का 75 से 100 मिलीलीटर तक काढ़ा दिन में 3 बार पिलाना चाहिए।
*अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 1 ग्राम और बायविडंग का चूर्ण 1 ग्राम दोनों को पीसकर देने से अधिक गम्भीर बच्चे भी नवजीवन पा जाते हैं।"

21 दाह (जलन) :-अनन्तमूल चूर्ण को घी में भूनकर लगभग आधा ग्राम से 1 ग्राम तक चूर्ण, 5 ग्राम शक्कर के साथ कुछ दिन तक सेवन करने से चेचक, टायफायड आदि के बाद की शरीर में होने वाली गर्मी की जलन दूर हो जाती है।

22 ज्वर (बुखार) :-अनन्तमूल की जड़, खस, सोंठ, कुटकी व नागरमोथा सबको बराबर लेकर पकायें, जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो उतारकर ठंडा कर लें। इस काढे़ को पिलाने से सभी प्रकार के बुखार दूर होते हैं।

23 विषम ज्वर (टायफाइड):-अनंनतमूल की जड़ की छाल का 2 ग्राम चूर्ण सिर्फ चूना और कत्था लगे पाने के बीड़े में रखकर खाने से लाभ होता है।

24 वात-कफ ज्वर :-अनन्तमूल, छोटी पीपल, अंगूर, खिरेंटी और शालिपर्णी (सरिवन) को मिलाकर बना काढ़ा गर्म-गर्म पीने से वात का बुखार दूर हो जाता है।

25 बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग) :-2 ग्राम अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण रोजाना खाने से सिर के बाल उग आते हैं और सफेद बाल काले होने लगते हैं।

26 खूनी दस्त :-अनन्तमूल का चूर्ण 1 ग्राम, सोंठ, गोंद या अफीम को थोड़ी-सी मात्रा में लेकर दिन में सुबह और शाम सेवन करने से खूनी दस्त बंद हो जाता है।

27 मूत्र के साथ खून का आना :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 50 ग्राम से 100 ग्राम को गिलोय और जीरा के साथ लेने से जलन कम होती है और पेशाब के साथ खून आना बंद होता है।

28 कमजोरी :-अनन्तमूल के चूर्ण के घोल को वायविडंग के साथ 20-30 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है।

29 प्रदर रोग :-50-100 ग्राम अनन्तमूल के चूर्ण को पानी के साथ प्रतिदिन 2 बार सेवन करने से प्रदर में फायदा होता है।

30 उपदंश (सिफिलिस) में :-उपदंश से पैदा होने वाले रोगों में अनन्तमूल का चूर्ण रोज 2 मिलीग्राम से 12 मिलीग्राम तक खाने से लाभ होता है।

31 पेशाब का रंग काला और हरा होना :-अगर पेशाब का रंग बदलने के साथ-साथ गुर्दे में भी सूजन हो रही हो तो 50 से 100 ग्राम अनन्तमूल का चूर्ण गिलोय और जीरे के साथ देने से लाभ होता है।

32 होठों का फटना :-अनन्तमूल की जड़ को पीसकर होठ पर या शरीर के किसी भी भाग पर जहां पर त्वचा के फटने की वजह से खून निकलता हो इसका लेप करने से लाभ होता है।

33 एड्स :-*अनन्तमूल का फांट 40 से 80 मिलीलीटर या काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर प्रतिदिन में 3 बार पीयें।
*अनन्तमूल को कपूरी, सालसा आदि नामों से जाना जाता है। यह अति उत्तम खून शोधक है। अनन्तमूल के चूर्ण के सेवन से पेशाब की मात्रा दुगुनी या चौगुनी बढ़ती है। पेशाब की अधिक मात्रा होने से शरीर को कोई हानि नहीं होती है। यह जीवनी-शक्ति को बढ़ाता है, शक्ति प्रदान करता है। यह मूत्र विरेचन (मूत्र साफ करने वाला), खून साफ करना, त्वचा को साफ करना, स्तन्यशोध (महिला के स्तन को शुद्ध करना), घाव भरना, शक्ति बढ़ाना, जलन खत्म करना आदि गुणों से युक्त है। इसका चूर्ण 50 मिलीग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह शाम खायें। यह सुजाक जैसे रोगों को दूर करता है।"

34 गठिया रोग :-लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अन्तमूल के रोजाना सेवन से गठिया रोग में उत्पन्न भोजन की अरुचि (भोजन की इच्छा न करना) दूर हो जाता है। गठिया रोग में अनन्त की जड़ को फेंटकर 40 मिलीलीटर रोजाना सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से रोग ठीक होता है।

35 गंडमाला (स्क्रोफुला) :-अनन्तमूल और विडंगभेद को पीसकर पानी में मिलाकर काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाने और गांठों पर लगाने से गंडमाला (गले की गांठे) दूर हो जाती हैं।

गुलाब-गुलकंद का जादू

* गुलाब को यों ही फूलों का फूल नहीं कहा जाता। दिखने में यह फूल बेहद खूबसूरत है और इसकी हर पंखुड़ी में समाए हैं अनगिनत गुण। त्वचा को सुंदर बनाने से लेकर शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने में गुलाब कितने काम आता है ।
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ुबह-सबेरे अगर खाली पेट गुलाबी गुलाब की दो कच्ची पंखुड़ियां खा ली जाएं, तो दिन भर ताजगी बनी रहती है। वह इसलिए क्योंकि गुलाब बेहद अच्छा ब्लड प्यूरिफायर है।
* अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्रोंकाइटिस, डायरिया, कफ, फीवर, हाजमे की गड़बड़ी में गुलाब का सेवन बेहद उपयोगी होता है।
* गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल चाय बनाने में भी होता है। इससे शरीर में जमा अतिरिक्त टॉक्सिन निकल जाता है। पंखुड़ियों को उबाल कर इसका पानी ठंडा कर पीने पर तनाव से राहत मिलती है और मांसपेशियों की अकड़न दूर होती है।

* पेट दर्द, यूरीन से जुड़ी दिक्कतों में भी गुलाब की पंखुड़ियों का पानी कारगर साबित होता है।
* गुलकंद का जादू
गुलकंद एक आयुर्वेदिक टॉनिक है। गुलाब के फूल की भीनी-भीनी खुशबू और पंखुड़ियों के औषधीय गुण से भरपूर गुलकंद को नियमित खाने पर पित्त के दोष दूर होते हैं तथा इससे कफ में भी राहत मिलती है। गर्मियों के मौसम में गुलकंद कई तरह के फायदे पहुंचाता है। हाजमा दुरुस्त रखता है और आलस्य दूर करता है। गुलकंद शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है और कब्ज को भी दूर करता है। सुबह-शाम एक-एक चम्मच गुलकंद खाने पर मसूढ़ों में सूजन या खून आने की समस्या दूर हो जाती है। पीरियड के दौरान गुलकंद खाने से पेट दर्द में आराम मिलता है। मुंह का अल्सर दूर करने के लिए भी गुलकंद खाना फायदेमंद होता है।
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गुलकंद
(गुलाब से बना टॉनिक)
स्त्री हो या पुरूष सबके सौंदर्य का एक अनूठा टॉनिक है गुलकंद जो गुलकंद खाता है वो गुलाब सा हो जाता है ।
बनाने की विधि –दो तीन अंजली भर कर गुलाब की ताजी व खुली पंखुडियॉं लें ,अब कांच की बडे मुंह की बोतल लें इसमें थोडी पंखुडियां डालें अब चाय का बडा चम्मच चीनी डालें फिर पंखुडियां फिर चीनी अब एक छोटा चम्मच पिसी छोटी इलायची तथा पिसा सौंफ डालें फिर उपर से पंखुडियां डालें फिर चीनी इस तरह से डब्बा भर जाने तक करते रहें इसे धूप में रख दें आठ दस दिन के लिये बीच- बीच में इसे चलाते रहें चीनी पानी छोडेगी और उसी चीनी पानी में पंखुडियां गलेंगी। (अलग से पानी नहीं डालना है) पंखुडियां पूरी तरह गल जाय यानि सब एक सार हो जाय ।लीजिये तैयार हो गया आपका सौंदर्य बढाने व बनाने वाला टॉनिक गुलकंद।

गठिया का उपचार

गठिया या संधिबात का की सबसे अछि दावा है मेथी, हल्दी और सुखा हुआ अदरक माने सोंठ , इन तीनो को बराबर मात्रा में पिस कर, इनका पावडर बनाके एक चम्मच लेना गरम पानी के साथ सुभाह खाली पेट तो इससे घुटनों का दर्द ठीक होता है, कमर का दर्द ठीक होता है, देड़ दो महिना ले सकता है ।

और एक अछि दावा है , एक पेड़ होता है उसे हिंदी में हरसिंगार कहते है, संस्कृत पे पारिजात कहते है, बंगला में शिउली कहते है , उस पेड़ पर छोटे छोटे सफ़ेद फूल आते है, और्फूल की डंडी नारंगी रंग की होती है, और उसमे खुसबू बहुत आती है, रात को फूल खिलते है और सुबह जमीन में गिर जाते है । इस पेड़ के पांच पत्ते तोड़ के पत्थर में पिस के चटनी बनाइये और एक ग्लास पानी में इतना गरम करो के पानी आधा हो जाये फिर इसको ठंडा करके पियो तो बीस बीस साल पुराना गठिया का दर्द इससे ठीक हो जाता है । और येही पत्ते को पिस के गरम पानी में डाल के पियो तो बुखार ठीक कर देता है और जो बुखार किसी दावा से ठीक नही होता वो इससे ठीक होता है ; जैसे चिकनगुनिया का बुखार, डेंगू फीवर, Encephalitis , ब्रेन मलेरिया, ये सभी ठीक होते है ।

बुखार की और एक अछि दावा है अपने घर में तुलसी पत्ता ; दस पन्दरा तुलसी पत्ता तोड़ो, तिन चार काली मिर्च ले लो पत्थर में पिस के एक ग्लास गरम पानी में मिलके पी लो .. इससे भी बुखार ठीक होता है ।

बुखार की एक और दावा है नीम की गिलोय, अमृता भी कहते है, उडूनची भी कहते है, इसको थोडासा चाकू से काट लो , पत्थर में कुचल के पानी में उबाल लो फिर वो पानी पी लेना तो ख़राब से ख़राब बुखार ठीक हो जाता है तिन दिन में । कभी कभी बुखार जब बहुत जादा हो जाते है तब खून में सेत रक्त कनिकाएं , प्लेटलेट्स बहुत कम हो जाते है तब उसमे सबसे जादा काम आती है ये गिलोय ।

नीम्बू से उपचार

निम्बू का सेवन प्रत्येक मौसम में किया जा सकता है|निम्बू का मुख्य कार्य शरीर में एकत्रित विषों को नष्ट कर शरीर से बाहर निकलना है|उबलते हुए पानी में निम्बू निचोड़ कर पिने से पूरे शरीर में नई शक्ति-स्फूर्ति अनुभव होती है|इस से आँखों कि रौशनी भी तेज होती है तथा मानसिक दुर्बलता,सिरदर्द बंद हो जाता है| निम्बू में विटामिन 'सी' का प्रचुर भण्डार है|


रक्त क्षीणता :
जिनके शरीर में रक्त कि कमी हो अथवा शरीर दिन ब दिन गिरता जाये तो ऐसे लोगों को टमाटर के रस के साथ निम्बू के रस का सेवन करना चाहिए|

उदर रोग:
एक गिलास गर्म पानी में निम्बू का रस मिलकर बार बार पिने से संपूर्ण पाचन तंत्र और शरीर कि धुलाई हो जाती है|इससे शरीर में तथा रक्त में जमा सभी विषेले पदार्थ मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाते है|यकृत के समस्त रोगों में निम्बू लाभदायक है|अपच होने पे निम्बू को काटकर उस पर नमक डालकर गर्म करके चूसने से खाना आसानी से पच जाता है|

पेट-दर्द
१२ ग्राम निम्बू का रस,६ ग्राम अदरक का रस तथा इतना ही शहद,मिलाकर पीने से पेट दर्द ठीक हो जाता है|निम्बू कि फांक में काला नमक नमक ,काली मिर्च एवं जीरा भर कर गर्म करके चूसने से भी पेट दर्द ठीक हो जाता है|भूख न लगने पर निम्बू और अदरक कि चटनी का सेवन करें,इस से हरा धनिया भी मिला सकते हैं|

कब्ज:
निम्बू का रस गर्म पानी में डालकर रात में लें तो सुबह खुलकर पेट साफ़ हो जाता है|निम्बू का रस और शक्कर १२ ग्राम एक गिलास पानी में मिलाकर सब को पिने से कुछ दिनों में पुराने से पुराना कब्ज ठीक हो जाता है|

दस्त:
दूध में नीबू निचोडकर पीने से दस्त में लाभ होता है|एक निम्बू का रस एक चम्मच पानी,जरा सा नमक और शक्कर मिलकर पांच बार नित्य पीने से दस्त बंद हो जाते हैं|

अम्ल पित्त:
निम्बू अम्ल का नाश करने वाला है|निम्बू का रस गर्म पानी में डालकर सायंकाल में पीने से अम्लपित्त नष्ट हो जाता है|एक कप गर्म पानी में एक चम्मच निम्बू का रस एक एक घंटे में तीन बार लें|

सर दर्द:
निम्बू चाय में निचोड़ कर पीने से लाभ होता है|निम्बू कि पत्तियों को कूट कर रस निकालकर सूंघने से भी सर दर्द ठीक हो जाता है|दिल घबराने,छाती में जलन होने पर ठन्डे पानी में निम्बू निचोडकर पीने से लाभ होता है|चक्कर आने पर एक कप गरमपानी में डेढ़ चम्मच निम्बू का रस डालकर पीने से लाभ होता है|

ज्वर:
जिसमे रोगी को बार बार प्यास लगती हो तो ऐसे में उबलते पानी में निम्बू निचोडकर पिलाने से ज्वर का तापमान गिर जाता है|मात्रा पानी एक कप निम्बू का रस दो चम्मच|

• दो निम्बू काटकर २५० ग्राम पानी में डालकर उबालें|जब पानी आधा रह जाये तो उतार कर छान लें|इसमें दो ग्राम सेंध नामक सेंक कर मिला लें और पि लें|यह एक खुराक है एवं ऐसे दिन में दो तीन बार लें|भोजन न करें|
• पानी में निम्बू निचोडकर स्वादानुसार शक्कर मिलकर पीने से मलेरिया ठीक होने में मदद मिलती है|फ्लू में भी गर्म पानी में निम्बू मिलकर पीने से इस रोग से बचा जा सकता है|

निम्बू को संस्कृत में निम्बुक तथा हिंदी में निम्बू ही कहते है | बंगला में पालितेबू, मराठी में लिंमू, गुजरती में कागदी लिंमू,तमिल में एलूमिच्चे और अंग्रेजी में( द लेमन ऑफ़ इंडिया ) कहते है | इसका लैटिन नाम है "साइट्रस लाइमोन" |

निम्बू का सेवन स्वस्थ्य व्यक्ति करते है तो आरोग्य की प्राप्ति होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रबल होती है | खट्टापन निम्बू का प्राकृतिक गुण है, हर निम्बू में खटास होती है, कोई अधिक तो कोई कुछ कम खट्टा होता है |

यह पाचक रसो को उत्तेजित करता है, मन्दाग्नि वालो की भूख जागृत करता है और पाचन क्रिया में सुधार लाता है | इसके रस से रोगोत्पादक कीटाणु नष्ट हो जाते है | यह रक्तपित-स्कर्वी रोग में बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है | इसके नियमित सेवन से संक्रामक रोगों से बचाव होता है | निम्बू का सेवन खाली पेट करने से ज्यादा लाभ होता है |

इसके सेवन के विधि :- निम्बू का रस विशुद्ध रूप में न पिए, पानी में मिलाकर पिए ,शुद्ध रस में तेजाब होता है, जिससे दाँत के इनैमल को हानी पहुंचा सकती है |
दूसरी बात इनके रस का सेवन हमेशा खाली पेट करें, तभी वह पूर्ण उपयोगी सिद्ध होगा अन्यथा लाभ अवश्य करेगा पर कुछ कम |
अगर प्रातः काल खाली पेट एक- दो गिलास ठंढे पानी में निम्बू का रस शहद मिलाकर लेने से शरीर की अच्छी सफाई हो जाती है |

निम्बू में रासायनिक तत्व :- रासायनिक दृष्टि से निम्बू में पानी ८५%,प्रोटीन १%, वसा ०.९%, कर्बोदित, ११.१% रेशे १.८%, कैल्सियम, .०.०७ फोस्फोरस ०.०३, लौह २.३ मिलीग्राम / १०० ग्राम और विटामिन सी , इन सबके आलावा निम्बू में थोड़ी मात्रा में विटामिन 'ए' भी होता है |

विभिन्न प्रकार के रोगों में आप निम्बू के रस की सहायता ले सकते है :-
अजीर्ण ( अपच ) :- इसकी शिकायत होने पर निम्बू, अदरक और सेंधा नमक मिलाकर भोजन से पहले खाना चाहिए, ऐसा करने से अपच नष्ट हो जाता है और वायु कब्ज़, कफ, आमवात ( गठिया ) का नाश होता है |
अम्लपित :- गर्म पानी में निम्बू का रस डालकर शाम को पिने से अम्ल्पति में राहत
उदरशूल :- निम्बू का रस १५ ग्राम, चुने का पानी १० ग्राम और मधु १० ग्राम तीनो मिलाकर २०-२० बूंद की मात्रा दिन में ३-४ बार लेने से उदरशूल में लाभकारी है |
अरुचि :- निम्बू के रस को गर्म कर उसमे शक्कर व इलायची चूर्ण मिलाकर सेवन करने से लाभ होती है |
सर्दी जुकाम ,दस्त, पथरी ,कमर दर्द, जवारा ज्वर, विच्छु का ज्वर , लीवर विकार,जीभ के छाले, चला जाता है | रक्तस्त्राव मौसमी बुखार जैसे